सोमवार, 25 दिसंबर 2017

मृत "आत्मा" का अस्तित्व -जानने हेतु पढ़ें !झा "मेरठ "

जैसे गर्भस्थ शिशुओं का केवल अनुभव किया जा सकता है -प्रत्यक्ष नहीं देखे जा सकते हैं | वैसे ही शास्त्र कहते हैं -भूतोमि देव योनयः -अर्थात भूत प्रेत की भी योनियां होतीं हैं | इतना ही नहीं ये देव तुल्य कार्य भी करते हैं | जैसे देवताओं का आवाहन ,पूजन और विसर्जन मन्त्रों से होता है  | वैसे ही भूत -प्रेत इत्यादि के आवाहन ,पूजन और विसर्जन मन्त्रों से होते हैं ये भी प्रत्यक्ष नेत्रों से देखे नहीं जाते हैं -कुछ प्रक्रियाओं से अनुभव किये जाते हैं | अब समझें कि ये भूत -प्रेत बनते कैसे हैं ---मृत शरीर के वैदिक रीति से संस्कार नहीं होने पर या संस्कारों को संक्षेप करने पर ये मृत आत्मा भटकती रहती हैं | -जैसे दाह संस्कार में कपाल क्रिया करने के बाद बांस को न जलाया जाय तो -आत्मा भूत राकस  आत्मा बन जाती है | पिण्डदान न किया जाय तो प्रेत योनि में रहती है आत्मा | अकाल मृत्यु का जैसा कारण होगा वैसी सूक्षम देह मिलती है आत्मा को | वेद ज्ञाता हो संस्कार ठीक से नहीं हो तो ब्रह्म पिशाच बनती है आत्मा | गर्भवती मृत आत्मा चुड़ैल बनती है | निष्णात व्यक्ति की आत्मा पिशाच बनती है | अनंत शास्त्रों के ज्ञाता की आत्मा ब्रह्म डाक या ब्रह्म डाकिनी बनती है | अब आप भयभीत न होकर ये समझें कि ऐसा क्यों होता है --तो -जानिए -नौ माह के बाद उत्तम संतान पृथ्वी पर आती है तो मृत आत्मा जो पार्थिव शरीर का परित्याग करती है उसे प्रेत शरीर धारण करने के लिए --13 दिनों का इंतजार करना होता है पिण्डदान द्वारा प्रेत शरीर का निर्माण होता है जब कोई पिंडदान ही नहीं करेगा तो आत्मा को सही शरीर नहीं मिलेगा -इस स्थिति में आत्मा को भूख -प्यास लगती है तो यह आत्मा किसी जीवित शरीर में ही सूक्ष्म रूप से प्रवेश कर जाती है | जब पिण्डदान के द्वारा प्रेत शरीर का निर्माण होता है तो उस प्रेतात्मा को 365 दिनों तक चलना होता है | प्रत्येक 30 दिनों में एक पड़ाव आता है जिसे छाया या मासिक कहते हैं | यहाँ मृत आत्मा के निमित जो व्यक्ति जो दान करता है उस दान से तृप्त होकर पुनः वो प्रेतात्मा आगे की ओर बढ़ती है --यदि कोई व्यक्ति अपने अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए मासिक दान नहीं करता है तो -भूखी- प्यासी ही आत्मा मार्ग में चलती रहती है और अपने ही वंश को श्राप देती रहती है | यदि को तरहवीं के साथ वर्षी का देता है तो वो दिवंगत आत्मा --प्रेत योनि में भटकी रहती है और अपने ही परिवार के लोगों क्लेश देती रहती है | ---ध्यान दें --हम आप में से बहुत से लोग हैं जो भूत -प्रेत को मिथ्या मानते हैं -----वास्तव में वैदिक धर्म में इन सभी प्रेतात्माओं को देव तुल्य माना गया है | जो पिता अपनी संतान के लिए कुछ दे गए क्या उनको हम कुछ नहीं दे सकते हैं | जैसे गर्भ के अंदर माता पिता अपनी -अपनी संतानों के लिए तीन संस्कार करते हैं जिनसे उत्तम संतान बने ठीक इसी प्रकार से संतानों को भी चाहिए अपने -अपने पूर्वजों के लिए  तेरहवीं ,मासिक ,और वार्षिक श्राद्ध विधिवत करें तो शायद न तो भूत -प्रेत होंगें न है श्राप लगेगा |
अतः ज्ञानी पुरुष मृत शरीर के संस्कार कर अपने -अपने पितृ ऋण से उऋण होते हैं | -ये संस्कार सभी सनातन धर्मी के लिए हैं | ये संस्कार आर्यावर्त के हैं | आप भी अलग नहीं हैं | आगे की चर्चा आगे करेंगें |आपका एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सेर्विस झा "मेरठ-- फ्री ज्योतिष एकबार सेवा हेतु यहाँ पधारें ----https://www.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri

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