रविवार, 8 अक्तूबर 2017

आप बीती पर है सच्ची -मेरी आत्मकथा "झा -मेरठ "भाग -{7}


-हमारे गुरुकुल की भव्यता बहुत अच्छी थी | चारो ओर हरियाली थी | आश्रम के आगे तालाब  था इर्द -गिर्द जंगल ,शमशान ,खेत पर चारो ओर सुनसान जगह थी | सोते समय लाशों को जलते देखता था पर मेरे सरकार साक्षात् ईश्वर थे ,उनका रंग ,वदन ,बाल ,दाढ़ी सदा एक जैसी रही | बड़े सदाचारी ,नियमवादी ,कर्मनिष्ठ ,सात्विक और सभी बालकों का भरण -पोषण कैसे हो इसके लिए निरंतर भिक्षाटन खुद करते थे | यहाँ ऐसे मर्मज्ञ और मूर्धन्य विद्वान थे जो मेरा सौभाग्य था | यहाँ हजारों श्लोक लोगों को केवल सुनने से आते थे | यहाँ मानों साक्षात् परमधाम था | ये सब सरकार की अथक परिश्रम से था | सरकार कहाँ से आये कौन माता पिता थे कहाँ के रहने वाले थे किसी को जानकारी नहीं थी | सरकार का स्वरुप लोगों को सतर्क रहने के लिए निरन्तर प्रेरित करता था | यहाँ के कई छात्र उच्च पद पर आसीन थे | हमलोगों को पढ़ाने के लिए दो आचार्य थे एक व्याकरण तो दूसरे वेद पढ़ाते थे आपस में दोनों शत्रु थे इसलिए दो गुटों में छात्र विभाजित थे पर सरकार इस बात से अनभिज्ञ थे | किसी व्यक्ति ने सरकार को भोजन में जहर दिया पर सरकार अंतर्यामी थे जान गये और भोजन नहीं किया | यहाँ व्यवस्था करने वाले के कारण छत्रों को खाने पीने में दिक्क्त होती थी न कि सरकार के कारण | मेरे सरकार होली पर मालपूआ खुद बनाते थे | मेरे सरकार की उदारता थी कि एकबार बराहक्षेत्र यानि नेपाल की यात्रा पर मुझको साथ ले गये पर ये क्या हुआ --सरकार नदी में स्नान कर रहे थे और सरकार के वस्त्र मेरे शरीर पर थे ,मैं भी नदी में प्रवेश कर अटखेली करने लगा | सरकार के वस्त्र नदी में समा गए -मुझको पत्ता ही नहीं चला | जब सरकार मुझसे वस्त्र मांगें तो मैं अकबका गया -मेरे सरकार की उदारता देखें गीले वस्त्र पहनकर निवास पर आये पर मुझको कुछ नहीं कहा | एकबार इस आश्रम में भगवानजी का घी किसी ने चुरा लिया पर पुजारीजी ने चोर मुझको बताया पर सरकार ने मुझसे कुछ नहीं कहा | एकबार कुछ खाने की इच्छा हुई तो ढाई सौ ग्राम गेहूं चुराकर भुनवाने गया तो व्यवस्थापकजी ने दंड के लिए कहा पर सरकार ने मुझको दंड नहीं दिया | एकबार गेंहूं पिसवाने के लिए मेरे सिर पर 25 किलो का कट्टा रख दिया मैं दुवला पतला था इसलिए उस वजन को ढो नहीं सका और वहीँ गिर गया पर मेरे सरकार ने मुझको कुछ नहीं कहा | अब मेरे सरकार को दया आयी मुझपर और भोजन बनाने का हटाकर चौका बर्तन का काम दिया ,यह काम मेरे लिए अति सरल था | अब पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं थी | आश्रम के परिसर में देवालय ,महाविद्यालय ,आवास ,मन्दिर ,संग्रहालय ,कुआ ,तालाब ,नल ,गोशाला ,खेलने का मैदान सब कुछ था मैं दौड़ने में सबसे तेज था | मेरे सभी सहपाठी हृष्ट -पुष्ट थे पर मैं कृष शरीर का था | एक गुरूजी थे अन्धे थे पर लधु सिद्धांत ,महाभाष्य ,यानि सभी ग्रन्थ उनकी जिह्वा पर थे -उनके सान्निध्य में हमने बहुत ग्रन्थों को याद किया | एक गुरूजी वेद चूड़ामणि थे उन्हें चारो वेद कंठाग्र थे उनके सान्निध्य में हम सभी वेदों को सीखने कोशिश की | एक गुरूजी ज्योतिषी थे निष्णात थे उनके सान्निध्य में हमने ताजीकनीलकण्ठी और मुहूर्त चिंतामणि जैसे ग्रंथों को याद किया | ---अभी राहु में गुरु मेंरे ऊपर चल रहे थे तो समय अनुकूल था | आगे की परिचर्चा कल करेंगें | ----दोस्तों आप भी अपनी -अपनी राशि के स्वभाव और प्रभाव को पढ़ना चाहते हैं या आपकी राशि पर लिखी हुई बातें मिलतीं हैं कि नहीं परखना चाहते हैं तो इस पेज पर पधारकर पखकर देखें - https://www.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri ---आपका -एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस झा मेरठ {भारत }-

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