सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

आप बीती पर है सच्ची -मेरी आत्मकथा "झा -मेरठ "भाग -{30}

2012 --यह मानों हमें बहुत कुछ देना चाह रहा था | मेरे पहली पुत्री -20 वर्ष की हो चुकी थी | मैं भले ही दरिद्र नारायण रहा पर मेरी पुत्री बड़े घर में रहे यह सबकी कामना होती है मेरी भी थी ---अस्तु --आज विवाह की परिभाषा बदल चुकी है -आज रूप सुन्दर ,धन उत्तम ,शिक्षा उत्तम ,कार्यरत कन्या ,माता पिता भी उत्तम दर्जे के होने चाहिए --भला ये सारी बातें मेरे जैसे साधारण पंडित के यहाँ कैसे संभव है | मेरे पास तो सुन्दर कन्या थी ,पढ़ी लिखी थी ,धन भी था पर कन्या की नौकरी नहीं थी ,कन्या नौकरी क्यों करें ,अगर कन्या नौकरी करें -तो वर घर क्यों न संभाले -साथ ही भारत नौकरी का तो निरंतर अभाव रहेगा ,जब सभी नौकरी ही करेंगें तो और कार्य कौन करेगा | खैर मत पूछिए ---मेरी सोच है -माता पिता अपनी -अपनी मातृ भूमि से जुड़े हों ,वर शिक्षा युक्त और कार्यरत हों ,कोई भी किसी के सहारे न हों पर प्रेम से ओत -प्रोत हों --तभी तो समधी का प्रेम समधी से वर का प्रेम कन्या से और संतान के संस्कार मातृ भूमि से जुड़े होंगें | --बहुत कठिनाई के बाद यह मुराद पूरी हुई | पुत्री बेंगलुरु में रहती है समधी मातृभूमि पर और संतान अब दोनों संस्कारों को समझेगी | मेरा जनेऊ संस्कार पिताने बड़े धूम -धाम से कराया था -आज यह मेरे लिए सुभाग्य की बात है पुनः उस मातृ भूमि पर जब हम 42 वर्ष के हुए तो जिस घर में अन्न ,वस्त्र के बिना बाल्यकाल बीता था वहां पहलीबार पिता को एक मुस्कुराहट दे पाया | अगर मुझको दान लेना होता तो मेरठ जैसे शहर में बहुत दानी हैं जिनके बदौलत उत्तम प्रकार से चिंता मुक्त विवाह संस्कार होते -पर --जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसे ---माता पिता और समाज के साथ -साथ अपनी मातृ भूमि के भी हम ऋणी हैं --उनका सम्मान हमारे ह्रदय में पहले होने चाहिए | ----आगे की चर्चा कल करेंगें ---फ्री ज्योतिष एकबार सेवा हेतु यहाँ पधारें ----https://www.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri

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