शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

आप बीती पर है सच्ची -मेरी आत्मकथा "झा -मेरठ "भाग -{22}

1999 -अब हम मेरठ में अपने आप को स्थापित कर रहे थे | परमात्मा और सद्गुरु की सच्ची कृपा तभी होती है जब आप सच्ची निष्ठा से जुड़ते हैं | अभी हमारे अंदर एक कमी थी -मेरठ में मेरा अनुज- मुझसे आठ वर्ष छोटा मुझसे सफल था किन्तु ज्ञान का आभाव था | मेरठ जैसे शहर में मंदिर में ज्ञानी पुरुष की जरुरत कम सेवक की ज्यादा होती है | अतः यह अनुज केवल आठवीं पास था, पर केवल धन की जिज्ञासा थी तो उसे मंदिर और निवास मिला था | इस अनुज ने प्रस्ताव दिया मेरे पास रहो ,हम एक अनुज को पहले ही खो चुके थे अतः अपनी संतान जैसा ही चाहते थे और इसे किसी प्रकार का कष्ट न हो यह सोचकर इसके पास -शिव चौक बागपत गेट मेरठ-रहने लगा और इसे पढ़ाने लगा | एक दिन 1999 में पिता के साथ बच्चे मेरठ आ गए ,पिता छोड़कर चले गए -उनके जाते ही मेरे नन्हें -नन्हें  बच्चियों को ताना मारने लगा, इस बात जानकारी मुझको मिली -मैंने कुछ नहीं कहा ,इसके बाद गर्मी का समय था हम बच्चों के साथ छत पर सो रहे थे तो अनुज ने कमरे में ताला लगा दिया ,मेरी छोटी सी डेढ़ साल की बच्ची दूध के लिए रोने लगी ,जब दूध लेने पतनी कमरे जाने लगी तो ताला लगा देखा -अनुज का अता -पत्ता नहीं चला ,मुझसे  बच्ची की दशा देखी नहीं गयी तो हमने  दरबाजे में धक्का दिया ताला सहित दरबाजा खुल गया | इसके बाद मेरे अनुज ने मकान मालिक से कहा ताला तोड़कर यह मेरे पैसे चुराया है और आपका दरबाजा भी तोड़ दिया | यह शब्द मानो मरने जैसा था | हमने मालिक से अनुरोध किया 15 दिन का समय दें हम घर चले जायेंगें, तत्काल बच्चों को लेकर कहाँ जायें | उन्होंने कहा अभी खाली करो मकान --अब हमने चन्द्रलोक मलियाना फाटक मेरठ के पास मेरे एक मित्र थे उनसे अनुरोध किया -उन्होंने मुझे पनाह दी -फिर किराये का मकान दिलाया -इस व्यक्ति ने अपनों से बढ़कर सम्मान दिया | अब मेरा न  ससुराल में कोई न परिजन कोई क्या करें ---अब हम सच्ची निष्ठा से परमात्मा के सहारे हो गए- फिर क्या था ----पत्रं पुष्पं फलं  तोयं मामेकं शरणं व्रज " परमात्मा ने दोनों हाथों से मुझको उठाया -कैसे -जानिए -एक व्यक्ति नाम सुरेश छारी निवासी -धौलपुर राजस्थान मेरठ में रहते थे वो मुझको जानते थे उनकी लड़की खो गयी थी मुम्बई में -हमसे पूछा महराज कैसे मिलेगी ,हमने कहा मिल जाएगी -पर खर्च बहुत होगा -बोले कोई बात नहीं | हमने कहा -मिल जाएगी तब तुम 11००० हजार दक्षिणा देना -पर मैं जो साधना करूँगा उसमें तुम्हें मेरे बच्चों की देखभाल करनी होगी ,हम एक मास बोलेंगें नहीं ,केवल साधना करेंगें ,और इस बीच हमारा राशन पानी सारी जिम्मेदारी तुम्हारी -बोले ठीक है -आप यज्ञ करो --ये व्यक्ति ऐसे थे मानो स्वयं मेरे पिता मेरी रक्षा करने हेतु पधारे हों | इन्होने इतना राशन लाया जिसे हम छे महीने ग्रहण किये ,बिस्तर ,चौकी ,मेरे बच्चों ने पहली बार पिता के साम्राज्य में उत्तम वस्त्र पहनें | अब हमें कोई चिंता नहीं थी तो चिंतन उत्तम होना लाजमी था ----अब हम एक अपना गाया हुआ भजन सुनायेंगें -यह स्तुति संस्कृत में है जरूर सुनें -आगे की चर्चा आगे करेंगें ---आपका एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस झा "मेरठ "

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