बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

आप बीती पर है सच्ची -मेरी आत्मकथा "झा -मेरठ "भाग -{18}

1993 -"पुनर्मूषको भव "---इसका अर्थ है दरिद्र थे दरिद्र ही रहो ---अस्तु --मुंबई में रहकर हमने जीना सीख ही रहे थे कि फिर एक मुसीबत का सामना करना पड़ा | ईधर भारतीय विद्या भवन के संरक्षक चाहते थे कि हम विदेश जाएँ संस्कृत का प्रचार प्रसार करें क्योंकि उनकी विदेशों में बहुत सी शाखाएं हैं जिनमें भारतीय लोगों को मौका मिलता है | हम भी जाना चाहते थे पर ---गौना {द्विरागमन }1993 में हुआ | पतनी पहलीबार ससुराल आयी | यहाँ मेरे गांव में पिताजी ने कभी लोन लिया था, धन तो मिला नहीं था ,पर जमीन के कागजात बैंक के पास थे वो जब्दी कुर्की का वारंट आया था | कुछ जमीन गिरबी रखी और हमने अपनी पतनी का मंगल सूत्र बेचा तब कर्य चुका | मुझसे छोटा भाई भी मेरठ आ चूका था घर पर केवल माता पिता थे तो उन्होंने कहा कर्य भी तुम्हारा और चाहे पढ़ो या मत पढ़ो | अब हमने सोचा पढ़ना नहीं है नौकरी करनी है | आज जो पिता हमें पढ़ाना चाहते थे वो खुद चाहते हैं कि हम न पढ़ें तो और कोई रास्ता नहीं था | मैंने एक रास्ता चुना -पिता से बोला आपको जो पूंजी मैं दूंगा उसको दुगुनी करके दिखानी होगी --बोले बिल्कुल ,मां से कहा एक वर्ष का आपका खर्च 3600 रूपये हैं मैं देता हूँ ,आप घर चलाओ साथ ही पतनी से कहा आपको एकवर्ष और मायके में रहना होगा सभी राजी हो गए | पर पैसा लाये कहाँ से मैं मुम्बई की जगह मेरठ आया --प्रभू की कृपा से इतनी कमाई हो गयी ---हमने पिता को 2500 रूपये दिए ,माँ को 3600 रूपये दिए और खुद पढ़ने मुम्बई चले गए | अब छे महीने हुए ही थे कि मां ने पत्र लिखा कुछ रूपये भेज दो --अगले साल के लिए धान खरीदेंगें | अब मैं छटपटाने लगा --जो माता पिता मुझको पढ़ाना चाहते थे उनको मेरे प्रति ऐसी भावना क्यों बन गयी | जिस मुम्बई ने मुझको नया रास्ता दिखाया ,मुझको होशियार बनाया ,अब छोड़ना पड़ेगा क्योंकि मुम्बई में एक समस्या है कोई धन तो दे देगा निवास नहीं देगा ,अपना कोई था नहीं अगर कोई होता तो हम वहां रहकर कमा सकते थे | अंत में यह सोचा मुम्बई को छोड़ देंगें --पेपर दिए,मुम्बई  पुनः कभी मार्कशीट लेने भी नहीं गया | प्राचार्य बोले अगर नहीं पढोगे तो तुम्हारे ऊपर संस्था ने जितना खर्च किया है ले लेगी | इस डर से कभी गया ही नहीं | आज मैं पुनः महादरिद्र हो गया | पतनी के विस्वास को तोडा ,जो माता -पिता मेरे भगवान थे आज भी भगवान मेरे हैं उन्होंने मेरी जिन्दगी बेकार कर दी | ----आगे की चर्चा आगे करेंगें |---आप चाहे बालक हों ,युवा हों ,गृहस्थ हों चाहें बुजुर्ग हों ! सभी के योग्य यह पेज https://www.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri है-- साथ ही एकबार फ्री ज्योतिष सेवा प्राप्त करें और ज्योतिष के ज्ञान के लेखों की नवीन गंगा में रोज डुबकी लगायें ।यकीं नहीं आता है तो शिकायत करें -09897701636 +09358885616 -आपका एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस " {मेरठ -भारत }संचालक -पंडित -के ० एल ० झा शास्त्री {शिक्षा -दरभंगा ,मेरठ ,मुम्बई }

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