रविवार, 8 अक्तूबर 2017

आप बीती पर है सच्ची -मेरी आत्मकथा "झा -मेरठ "भाग {10}-

अब जो हम लिखने जा रहे हैं -उसके लिए अदम्य साहस की जरुरत है | मेरी जीवनी जीवन्त उदहारण है | आज तक किसी की जीवनी प्रत्यक्ष नहीं लिखी गई साथ ही लिखने वाले कोई और हुए ,पर हम जब लाखों लोगों से जुड़े हैं | अपने बारे में बताना ,सही राह दिखाना हमारा कर्तव्य है | ----अस्तु --बाल्यकाल में पिता की जेब से पैसे चुराकर चॉकलेट खाता था | आज फिर हमने आश्रम में भूख लगने के कारण एक आचार्य की पेटी खुली थी उसमें से मिश्री चुराकर खा ली, एक किलो मिश्री थी ,कई दिनों तक खाता रहा किसी ने पकड़ ली और शिकायत की पर उन्होंने कुछ नहीं कहा | एकबार एक आचार्य अपने साथ यज्ञ स्थान -अंदौली -जिला -दरभंगा {बिहार }ले गए | वहां हमने देखा जो यज्ञ के लिए आचार्य थे उनको हमारे आचार्य ने चुनौती दी मैं हार जाऊंगा  तभी आप आचार्य बनोगे पर उन्होंने बिना शास्त्रार्थ किये हमारे आचार्य को आचार्य बनाया | यज्ञ हमारे आचार्य के सान्निध्य में पूर्ण हुआ ,हमारे आचार्य को बहुत धन मिला हमें वही धन मिला जो सबको मिला ,सेवा हमने की जीत में हम साथ थे तो हमने आचार्य की धोती में श्री हरि स्वर्ण के थे चुरा लिया इस बात की भनक भी नहीं होने दी | हम घर आये मां से चोरी की बात नहीं कही ,मेरी दीदी का गौना होने वाला था तो हमने उसे यह स्वर्ण देने के लिए कहा -जब वह स्वर्ण स्वर्णकार के पास गया तो नकली था | अब हमारा महाविद्यालय में प्रवेश हुआ | इससे पूर्व एक हादसा हो गया --मेरे एक दोस्त नाम -महादेव झा ,ग्राम रसियारी जिला दरभंगा {बिहार }से अटूट दोस्ती थी | हर यज्ञ में में हम साथ -साथ रहते थे | एक यज्ञ -गांव -हरिलाखी घनश्यामपुर जिला दरभंगा {बिहार }में हुआ | यहाँ हम दोनों ने एक लड़की देखी वो दोस्त के मामा के भाई की बेटी थी | अभी हम प्रेम को नहीं जानते थे क्योंकि 15 वर्ष का था मैं | उस यज्ञ में हम दोनों बालक तो थे ही यज्ञ के साथ -साथ धार्मिक फ़िल्म का भी आनन्द ले रहे थे पत्ता नहीं जैसे हम दोनों यज्ञ के साथ -साथ मेले के तमाम चीजों का आनन्द ले रहे थे वैसे ही वो लड़की भी ले रही थी | हर पग -पग पर उससे हमलोगों की मुलाकात हो जाती थी और वार्तालाप भी | हमलोग यज्ञ के बाद अपने आश्रम आ गए बात वहीँ खत्म हो गयी | पर एकदिन मेरे मित्र ने कहा वो मुझसे प्रेम करती है ,मेरी बात होती है | मैं भला उससे कम कैसे रहता | मैंने कहा मुझको उसका नाम पत्ता बताओं मैं उसके नाम चिट्टी लिखूंगा | दोस्त ने मुझको नाम पत्ता दिया हमने उसके नाम रजिस्ट्री चिट्ठी लिखी साथ में अपने आश्रम का पत्ता भी | वो चिट्ठी उसके दादा के पास गई|  दादाने चिट्ठी के बारे में जानना चाहा और चिट्ठी पढ़ी --चिट्ठी में जो शब्द थे वो पढ़कर हैरान हो गए --शब्द थे मरे हाथों की लकीर तुम्हारे हाथों की लकीर से मिलती है | दादा ये सोचने लगे एक तो धार्मिक स्थान उसमें भी छोटे बालक पर चिट्ठी के शब्द तो ऐसे थे जैसे मानों किसी परिपक्व खिलाडी ने लिखे हों | लड़की के पिता सेना विभाग में थे उनको खबर मिली उन्होंने तो सीधे गोली मारने की बात कही | पर जहाँ हमारा आश्रम था वहीँ मेरे मित्र के मामाजी पढ़ाते थे ,उनको यह खबड़ मिली तो उन्होंने कहा हम बात करेंगें आपलोग मत जाओ | यह चिट्ठी मेरे प्राचार्य के हाथ आयी | मेरे दोस्त ने कहा प्राचार्य बुला रहे हैं | हम प्राचार्य के समीप गए ,प्राचार्य ने पूछा यह चिट्ठी तुमने लिखी है -हमने कहा जी फिर क्या था एक थपड मुझको मारा थपड़ लगते ही मेरा ललाट अलवारी से टकराया और फट गया | मैं जन्मजात निर्वल शरीर से था | खून की धारा वहने लगी आगे मारने का साहस आचार्य में नहीं था क्योंकि वो संत थे | बोले -मेरे सामने से दूर हो जाओ ,मैंने कहा -मैं कही नहीं जाऊँगा आचार्य !मुझको मार दो !मैं अब खुद जीना नहीं चाहता हूँ | भीड़ एकत्रित हो गई | हम दोनों को आश्रम से निकाल दिया गया | अब हम कहाँ जाये ,घर जा नहीं सकते थे ,पैसे थे नहीं ,मददगार था नहीं -फिर सोचा दिल्ली चलते हैं दोस्त को दिल्ली की जानकारी थी | ट्रेन में बैठ गए ,समस्तीपुर आये बिना टिकट शाम होने वाली थी मेरे दोस्त के पास  10 रूपये थे ,मेरे पास कुछ नहीं था ,भूख से मैं तड़प रहा था ,क्या करूँ ,फिर हमने दोस्त से कहा मैं दिल्ली नहीं जाऊंगा वापस घर आया | कई दिनों के बाद मां को यह कहानी बतायी | फिर मेरे ताऊ मेरे सरकार से क्षमा मांगी तब फिर सरकार ने आश्रम में रहने की अनुमति दी | | आगे की परिचर्चा कल करेंगें | आपका एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस झा "मेरठ "
--दोस्तों आप भी अपनी -अपनी राशि के स्वभाव और प्रभाव को पढ़ना चाहते हैं या आपकी राशि पर लिखी हुई बातें मिलतीं हैं कि नहीं परखना चाहते हैं तो इस पेज पर पधारकर पखकर देखें - https://www.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri ---आपका -एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस झा मेरठ {भारत }

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